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रोल मॉडल बनेगी राज्य की यह गणना देश के लिए: नीतीश

बिहार में जातीय गणना पूरी रिपोर्ट शीघ्र सार्वजनिक होगी

पटना। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि बिहार की जातीय गणना देश में मॉडल बनेगी। जाति आधारित गणना का काम बिहार में पूरा हो चुका है। इस सर्वे में मुख्य बात यह है कि सबकी आर्थिक स्थिति का भी पता चल जाएगा। केवल जातियों की संख्या घोषित करने के लिए ये सर्वे नहीं करवाया जा रहा है। शीघ्र ही इसकी रिपोर्ट भी सार्वजनिक हो जाएगी। इसमें लगे हुए लोगों को जितना काम करना था, उनलोगों ने कर लिया है। अब तो कई राज्यों में इसकी मांग उठने लगी है। जब बिहार में जाति आधारित गणना का काम हो जाएगा तो अन्य राज्य के लोग भी इसको देखेंगे। कई राज्य अपने स्तर से जाति आधारित गणना को कराना चाहते हैं।

मुख्यमंत्री स्व. बी.पी. मंडल जी की जयंती के अवसर पर पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सभी पार्टियों की मीटिंग के बाद ही हमने जाति आधारित गणना का फैसला लिया था। यह कोई निजी कार्यक्रम नहीं था। इसमें सभी जातियों की गणना के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति का भी पता चल जाएगा, चाहे वे किसी भी जाति के हों। उच्च जाति के हों, पिछडे हों, अतिपिछड़े हों या अनुसूचित जाति-जनजाति के। किस जाति में कितनी उपजातियां हैं, उनकी आबादी कितनी है और उनकी आर्थिक स्थिति क्या है, जाति आधारित गणना से ये सारा स्पष्ट हो जाएगा। पहले कोई गांव में रहता था। लेकिन, अब अगर वो दूसरी जगह चला गया है तो उसकी वास्तविक स्थिति क्या है, सर्वे करने वाले को ये सब अध्ययन करके रिपोर्ट देनी है।

जातिगत जनगणना क्या होती है ?

भारत में हर 10 साल में एक बार जनगणना की जाती है। इससे सरकार को विकास योजनाएं तैयार करने में मदद मिलती है। किस तबके को कितनी हिस्सेदारी मिली, कौन हिस्सेदारी से वंचित रहा, इसके माध्यम से इन सब बातों का पता चलता है। जातिगत जनगणना से आशय यह है कि जब देश में जनगणना की जाए तो इस दौरान लोगों से उनकी जाति भी पूछी जाए। इससे देश की आबादी के बारे में तो पता चलेगा ही, साथ ही इस बात की जानकारी भी मिलेगी कि देश में कौन सी जाति के कितने लोग रहते है। सीधे शब्दों में कहें तो जाति के आधार पर लोगों की गणना करना ही जातीय जनगणना होता है।

 

आखिरी बार कब हुई थी जातिगत जनगणना ?

भारत में आखिरी बार जाति के आधार पर जनगणना ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1931 में हुई थी। इसके बाद 1941 में भी जातिगत जनगणना हुई, लेकिन इसके आंकड़े पेश नहीं किए गए थे। अगली जनगणना 1951 में हुई लेकिन तब तक देश आजाद हो चुका था और आजादी के बाद इस जनगणना में सिर्फ अनुसूचित जातियों और जनजातियों को ही गिना गया। मतलब देश की आजादी के बाद साल 1951 में अंग्रेजों की दी हुई जातिगत जनगणना की नीति में बदलाव कर दिया गया, जो साल 2011 में की गई आखिरी जनगणना तक जारी रहा।

इसी बीच साल 1990 में केंद्र सरकार ने मंडल आयोग की एक सिफारिश को लागू किया था। इसके अंतर्गत पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27% आरक्षण देने की बात थी। इस फैसले ने भारत, खासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया।

जानकारों का मानना है कि भारत में ओबीसी आबादी कितनी प्रतिशत है, इसका कोई ठोस प्रमाण फिलहाल नहीं है। मंडल कमीशन के आंकड़ों के आधार पर कहा जाता है कि भारत में ओबीसी आबादी 52 प्रतिशत है। हालांकि, मंडल कमीशन ने साल 1931 की जनगणना को ही आधार माना था। केंद्र सरकार अभी भी जाति के आधार पर कई नीतियां तैयार करती है, जिसका आधार 1931 की जनगणना है।

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Author: fastblitz24

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